
Pakistan की सियासत में एक बार फिर बड़ा धमाका हो गया है। जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को लेकर देशभर में हंगामा मचा है। उनके घरवाले और PTI नेता दावा कर रहे हैं कि उन्हें परिवार से मिलने नहीं दिया जा रहा है, जबकि बलूचिस्तान मीडिया के एक रिपोर्ट ने आग में घी डाल दिया— “इमरान खान को जेल में ज़हर देकर मार दिया गया।”
बस… फिर क्या था!
देशभर में गुस्सा फूटा, लोग जेल के बाहर धरने पर बैठ गए और इमरान के जिंदा होने का सबूत मांगने लगे। सवाल सीधा है— क्या पाकिस्तान में सत्ता से टकराने की सज़ा हमेशा मौत, जेल या निर्वासन ही होती है?
Pakistan में Democracy नहीं… Army-cracy
पाकिस्तान में ये पहली बार नहीं है कि सत्ता विरोधी नेताओं को कुचला जा रहा हो। असलियत ये है कि यहां दशकों से सेना ही असली सरकार है—PM सिर्फ दिखावे का चेहरा।
जब भी किसी नेता ने सेना की मनमानी पर सवाल उठाया, उसका अंत दर्दनाक हुआ।
पाकिस्तान के “Top Political Victims”
जिन्होंने Army की नाराज़गी झेली…
जुल्फिकार अली भुट्टो – सीधे फांसी पर चढ़ा दिए गए
PPP के फाउंडर भुट्टो को 1977 में जनरल ज़िया-उल-हक ने तख्तापलट के बाद गिरफ्तार कर लिया। सिर्फ 2 साल बाद—1979 में उन्हें फांसी दे दी गई। पूरा पाकिस्तान आज भी इस फैसले को सेना की राजनीति का काला धब्बा मानता है।
बेनजीर भुट्टो – दो बार PM, फिर निर्वासन और हत्या
बेनजीर दो बार प्रधानमंत्री रहीं, पर सेना ने लगातार उनका रास्ता रोकते हुए सरकार गिराई, भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, निर्वासित किया और फिर 2007 में उनकी हत्या, जिसमें सेना की भूमिका पर बड़े सवाल उठे।

असिफ अली जरदारी – 11 साल जेल, फिर भी सेना की “इजाज़त” पर लौटे
बेनजीर के पति और पाकिस्तान के राष्ट्रपति रह चुके असिफ अली जरदारी पर भी सेना ने भारी दबाव बनाया। उन्हें 11 साल जेल में रखा गया और बाद में उन्हें भी विदेश भागना पड़ा। आज भी उनकी राजनीति Army की अनुमति पर चलती है।
नवाज शरीफ – भ्रष्टाचार के नाम पर बाहर का रास्ता
2017 में पनामा पेपर केस के बाद सेना-समर्थित व्यवस्था ने नवाज को राजनीति के लिए अयोग्य घोषित कर दिया, जेल भेजा, निर्वासित किया 2023 में वे वापस आए, लेकिन उनकी राजनीतिक चमक फीकी पड़ चुकी है।
शहबाज शरीफ – PM तो हैं, लेकिन असल में Army के ‘प्रोजेक्ट’
नवाज के भाई शहबाज सेना की पूरी सपोर्ट से PM बने। लेकिन उन पर आरोप है कि वे Army के दबाव में इमरान खान सरकार पर दमन करते रहे।
तो क्या इमरान खान भी उसी लिस्ट में शामिल हो चुके हैं?
इमरान खान को लेकर जिस तरह की रिपोर्टें, हंगामा और दमन सामने आ रहा है, उससे एक सवाल फिर उठ रहा है— क्या पाकिस्तान में कोई भी नेता Army के खिलाफ बोलकर सुरक्षित रह सकता है?
कहानी वही है— नाम बदल जाते हैं, लेकिन शिकार वही होते हैं जो Army को चुनौती देते हैं।
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